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क्या इसी बदलाव का सपना देख रहे थे सारे भारतीय

     कई मुस्लिम परिवारों में ईद से पहले अपने बच्चों का इंतजार हो रहा था, लेकिन सबका इंतजार पूरा नहीं हुआ. ईद से दो दिन पहले किसी अब्बा को पता चलता है कि घर से बाहर गया उनका बेटा अब नहीं रहा. इस बात को वो शायद किसी तरह हजम भी कर लेते, लेकिन उन्हें इसका क्रूरतम रूप देखने को मिला. एक पिता को खबर मिली कि उनके बेटे जुनैद को ट्रेन में पीट-पीटकर मार डाला गया. वो ट्रेन दिल्ली से बल्लभगढ़ होते हुए मथुरा जा रही थी. जुनैद ने कुर्ता पहन रखा था. उसके सिर पर टोपी और चेहरे पर दाढ़ी थी. हत्यारों को उसकी बातों से ज्यादा शायद उसके हुलिए से तकलीफ थी. अब इसके असर के बारे में सोचिए. भारतीय राजनीति में जातिवाद हमेशा घुला रहा है, लेकिन धर्मों का सैन्यकरण समाज को हाशिए पर ले जाकर खड़ा कर देगा, इसका अंदाजा किसी को नहीं था. अगर किसी को रहा भी होगा, तो वो इग्नोर करके आगे बढ़ गया. हाशिम, जुनैद, मोईन और शाकिर दिल्ली से ईद की खरीदारी करके मथुरा लौट रहे थे. ट्रेन में कुछ लोगों ने उन पर गोमांस ले जाने का आरोप लगाया और गद्दार कहा. उनकी दाढ़ी पकड़ने (नोचने) की कोशिश की गई. जिन लोगों को इ...

पूरे देश को खाना खिलाने वाला खुद घास और चूहे खाकर पेशाब पी रहा है

पिछले 40 दिनों से लगभग हर अखबार की खाली जगह भरने और हर चैनल का बुलेटिन पूरा करने के लिए एक ही खबर का इस्तेमाल किया जा रहा है। दिल्ली में तमिलनाडु के किसानों का विरोध प्रदर्शन। अपनी मांग रखने के लिए सभी गांधीवादी तरीके अपना चुके ये किसान आखिर में अपना पेशाब पीने को मजबूर हो गए, लेकिन लुटियंस दिल्ली में बैठने वाले सरकार के किसी प्रतिनिधि के कानों तक इनकी आवाज नहीं पहुंची। मल खाने तक की धमकी दे चुके ये किसान आज अगर बंदूक उठा लें, तो नक्सलवाद का ठप्पा इन्हें व्यवस्था से बाहर कर देगा। डर इस बात का है कि डिजिटल इंडिया के निर्माण की प्रक्रिया में हम उस धड़े की उपेक्षा कर रहे हैं, जो जीवन की सबसे बेसिक जरूरत को पूरा करने वाली इकाई है। एक तरफ उत्तर प्रदेश के किसानों का कर्ज माफ किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ तमिलनाडु के किसानों को मानव-मल खाने की धमकी देनी पड़ती है। कल तक सत्ता तक पहुंचने का जरिया रहे ये किसान आज सत्ता की अनुपलब्धता का श्राप झेल रहे हैं। एक आम भारतीय को न तो अजान की आवाज से तकलीफ होती है और न मंदिर के घंटे से, लेकिन अपने अन्नदाता की ऐसी दुर्गति जरूर उसके मन को क...

नाइजीरिया के लोगों को झुंड में पीटकर हम दुनिया को कौन सा चेहरा दिखा रहे हैं??

नोएडा कहिए, नवेड्डा कहिए या गौतम बुद्ध नगर. इस जगह के जितने भी नाम हों, लेकिन इसके आचरण में बुद्ध का लेशमात्र भी नहीं है. NCR का ये हिस्सा पिछले कुछ दिनों से सुर्खियों में है. मनीष खारी नाम के 12वीं के छात्र की मौत के बाद यहां भूचाल सा आ गया. बच्चे की मौत से गुस्साए स्थानीय लोगों ने यहां रहने वाले नाइजीरियाई मूल के लोगों की बड़ी बेरहमी से पिटाई की. 'अतिथि देवो भव:' की संस्कृति वाले इस देश में हमने पूरे दिन टीवी चैनलों पर देखा कि कैसे नाइजीरिया के मेहमानों को घेर-घेरकर उनकी हड्डी-पसली एक कर दी. सड़क पर, पान या चाय की दुकान पर ऐसे नजारे हम भारतीयों के लिए आम हैं, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ, जब लोगों ने शॉपिंग मॉल में ऐसी पशुता दिखाई हो. यकीनन, इस पर यकीन करना मुश्किल था. लोगों के हाथ में कुर्सी, रॉड या जो भी चीज आ रही थी, वो उससे पिटाई कर रहे थे. बाकी खड़े लोग सिर्फ तमाशा देख रहे थे. पुलिस के लाठीचार्ज से पहले किसी ने बीच-बचाव करने की जहमत नहीं उठाई. नोएडा में सिर्फ नाइजीरियाई लड़कों ही नहीं, बल्कि लड़कियों के साथ भी वही हिंसक सलूक हुआ. लड़कियों पर हाल ही में सबसे ताक...